मानव

मानूस की खिलखिलाती हसीं नहीं हूं,
मैं चीख हूं, चिंघाड़ हूं।
धरा पे आदम के कष्टों का,
मैं प्रचंड पहाड़ हूं।
जीत की खुशी नहीं हूं,
मैं हार का वो घाव हूं।
मरहम की पट्टी नहीं मैं,
उस लालित खून की धार हूं।
सुविधा से बंधा भार नहीं मैं,
ग़रीबी की कूपित मार हूं।
अनुकूल हवाओं में बढ़ा नहीं मैं,
प्रतिकूल तूफ़ानों का सारांश हूं।
मैं रात्री का चांद नहीं हूं,
तमस सा, शशि अमाव‌स्य हूं।
द्रव्य धन से मिली खुशी नहीं मैं,
हलाहल की हाहाकार हूं।
जीवित मात्र वो शरीर नहीं मैं,
मैं मानव का विस्तार हूं।
सारंगी से पैदा मधुर वाद नहीं मैं,
डमरू से तांडव का आभार हूं।
पार्वती की ममत्व नहीं मैं,
काली की भीषण हूंकार हूं।

मनुष्य मैं आजाद नहीं हूं,
कृतज्ञ उन माताओं का ऋणी हूं।
मुदित सदा जिनका क्रंदन रहा था,
मैं उनका श्रृंगार हूं।
उनके मुर्झित कल्पित चेहरों पे,
उस हसीं का भाव हूं।
उस हसीं का भाव हूं।।

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